DR. MAYA SHANKAR JHA

SOCIAL WORKER & TEACHER

हे हंसवाहिनी माँ,  चरणों में हम हैं शीश झुकाए

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माँ शारदे विनय अछि,

दी विद्या-बुद्धि सुन्दर ..........  दी विद्या-बुद्धि सुन्दर!

 

माँ वरदे शरण मे राखी,

बनी मैथिली सम मिठगर  बनी मैथिली सम मिठगर!

हे माँ कृपा अहाँ के - जीवन बनल सनाथे !

माता-पिता-गुरुकेर आशीष चढल अछि माथे !

करी सेवा मातृभूमिक - निज देश मनुज प्रदेशे .......

                                    निज देश मनुज प्रदेशे!

माँ शारदे विनय अछि...

निज धर्म कर्म सत् हो, तप-दान मे महारत !

ई सिर कतहु झूकय नहि, नित-चरित के सोगारथ !

 

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चरणों में हम हैं शीश झुकाए

 

हे हंसवाहिनी माँ ,हम शरण में तेरी आये !

घर ज्योतिर्मय कर दो ,हम अभिलाषाये लाये !!

तुम वीणा धारी हो ,विद्या और वाणी हो तुम !

विज्ञान की हो जननी ,जन जन कल्याणी हो तुम !!

तेरे कर में पोथी है , तू ज्ञान की अनुपम ज्योति है !

विद्धवान बना देती है पल में ,जिस पर खुश होती हो !!

तुमने ही कालिदास, तुलसीदास, महाकवि बना डाले !!

माँ दया की द्रष्टि डालो ,चरणों में हम हैं शीश झुकाए !!

 

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ॐ आद्यलक्ष्म्यै नम:      ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:

सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:  ॐ अमृतलक्ष्म्यै नम:

ॐ कामलक्ष्म्यै नम:      ॐ  सत्यलक्ष्म्यै नम:

ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:      ॐ योगलक्ष्म्यै नम:

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 VIEWS OF DR. JHA :

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Honesty is very expensive gift.

        Do not expect it from cheap people.

                  .........  Dr. Maya Shankar Jha 

 

 

     हर जोर जूल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है .

      हम भारत के रहने वाले हैं , भारत वर्ष हमारा है .

 

HAR JOR JULM KE TAKKAR MEIN SANGHARSHA HAMARA

NARA HAI.
        

HAM BHARAT KE RAHNE WALE HEIN, BHARAT WARSHA

HAMARA HAI.

 

MY BEST PROJECT & MISSION IS :

 

Works with different variety of projects in

many educational and development related

endeavors. Our mission is to address the

issues concerning access to education by

financially backward children, ensure every

child has access to education that is

meaningful, retain the students and

encourage meritorious students to

continue their education. With these goals

in mind we have invested our energies in

supporting different types of projects

where each of the project plays an

important role to address issues at the

ground level.

 

तुम हमको नहीं चाहो , इसकी हमें परवा नहीं ,

 

हम वादें के पक्के हैं , तुम्हें अपना बना लेंगे !!

    

 

मानव सेवा ही परम सेवा है :       

 

हृदय की सच्ची और शुद्ध कामना अवश्य पूरी होती है।

अपने अनुभव में, मैंने इस कथन को सदा सही पाया है।

गरीबों की सेवा मेरी हार्दिक कामना रही है और इसने

मुझे सदा गरीबों के बीच ला खड़ा किया है । मुझे उनके

साथ तादात्म्य स्थापित करने का अवसर दिया है। मैंने

जीवन भर निर्धनों से सदा प्रेम किया है और भरपूर

मात्रा में किया है। मैं अपने विगत जीवन के अनेक

उदाहरण देकर यह स्पष्ट कर सकता हूँ कि मेरा यह प्रेम

मेरे स्वभाव का अंग है । मुझे गरीबों के मध्य और

अपने बीच कोई फर्क महसूस नहीं हुआ है । मुझे वे सदा

अपने सगे-संबंधी ही लगे हैं। भारत भारती समाज की

स्थापना करने के बाद से मुझे और भी अदम्य विश्वाश

हो गया है कि मानव सेवा ही परम सेवा है ।

 

मन का सत्यापन वास्तव में सत्य का सत्यापन है. यह

सच है की सत्य या अवधारणा की समीक्षा की कोई

समान्य पद्ति नही है ।  इस लिए हम सब अपनी

अपनी आस्था के साथ जीते हैं

 

                                           आपका मित्र ,

                                      डॉ. माया शंकर झा ,

                                      भारत भारती समाज

                                                  कोलकाता

                      

 

                         आशा

 

           असफलता मत रोक मुझे तू
             

            हट जा दूर निराशा

           

            तुझमे उतनी आग नहीं

 

            है मुझमे जितनी आशा   

 

 

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PROFILE OF DR. MAYA SHANKAR JHA         The Great Social Worker & Educationist

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मैं हर उस व्‍यक्‍ति‍ का आदर करता हूँ जो सामान्‍य

शि‍ष्‍टाचार का व्‍यवहार करता है। वि‍चार में वे अलग भी

हो सकते हैं ।



           हम लाचार से आज

 

ढूढ़ती रही निगाहों में..तस्वीर सच्ची ..

धागा विशवास का यहाँ जोड़ता कौन है ||

प्रश्न चिन्ह से खड़े हैं देखो चारों ओर ही |

रहे मन में यकीन भी उत्तर देता कौन है ||

खड़े हैं मरुस्थलों में.. हम लाचार से आज |

दिखते हाथ बहुत से मगर थामता कौन है ||

 

 

                     अपनों की मार

 

अपनों की मार बड़ी तगड़ी होती है। ये ठीक वैसे ही होता

है जैसे -

 

मुझे तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था।

 

मेरी कश्ती वहीं डूबी जहां पानी कम था।

 

जिन पर हम भरोसा करते हैं, अगर उनसे धोखा मिले

तो फिर भरोसा ही टूट जाता है

 

                                           सुरक्षा कवच

 

अच्छे काम करते समय जो हमें अन्दर से आनन्द,

उत्साह और निर्भयता प्राप्‍त होती हैं, वह भी ईश्‍वर की

तरफ़ से हमारे लिये आशीर्वाद हैं। बुरे काम करते समय

जो हमें अपने अन्दर से भय, शंका और लज्‍जा का

अनुभव होता हैं, वह ईश्‍वर की तरफ़ से हमारे लिये

सुरक्षा कवच हैं।

 

                पर्यावरण की सुरक्षा

 

सभी सुधी जनों को सादर नमन करते हुए थोड़ी बातें

पर्यावरण सुरक्षा की पेश हैं, सभी से अनुरोध है -

निम्नलिखित पंक्तियाँ लाईक करना जरूरी नहीं है,

किन्तु जीवन में इनका पालन करना जरूरी है।



       हमें प्रकृति ने दिया तोहफा, धरती और गगन है।

   वीरान हो रही इस धरती को, करना इसे चमन है।।

  

मानव हित मरने वाले ही इतिहास बनाते,

पर्यावरण समर्पित जो भी, उनको सदा नमन है।।

  पेड़ काट कर ये मत भूलो, खुद जीवन से खेल रहे हो।

 इसी वजह से हर बीमारी, की सड़ाँध तुम झेल रहे हो।।

 

पर्यावरण स्वच्छ रख कर ही, हम सब जीवित रह पाएंगे

इस पर दिया न ध्यान इसलिए, जीवन में फेल रहे है।

 

       आज प्रदूषण चतुर्दिशा, मानव की आस अधूरी है।

       धरती को वीरान कर रहे, यह कैसी मजबूरी है।।

 

कटते पेड़-उजड़ते वन से, खतरे में मानव का जीवन,

इसीलिए मानव के हित में,स्वच्छ-पर्यावरण जरूरी है।।

 
      पर्यावरण सुरक्षित रख के, इसको स्वच्छ बनायेंगे।

      हर कीमत पर हरी-भरी, धरती को सदा बचायेंगे।।

 

घोर प्रदूषण में घुट-घुटकर, मानव जीता आया है,

पर्यावरण संरक्षण की हम घर-घर अलख जगायेंगे।।

 


बहुत याद आऊंगा.......


          मैं तो चिराग हु तेरे आशियाने का,

          कभी न कभी तो बुझ जाऊंगा;

          आज़ शिकायत है तुझे मेरे उज़ाले से,

          कल अँधेरे में तुम्हे बहुत याद आऊंगा.......

                                

 

                                            वजह पूछ लेते हैं

 
"खामोश बैठें तो लोग कहते हैं उदासी अच्छी नहीं,

ज़रा सा हँस लें तो मुस्कुराने की वजह पूछ लेते हैं!"

 

 

जानना चाहता नहीं

 

चढ़ रहे... मंदिरों में भोग हैं |

रुल रहे रस रसीले संजोग हैं |

ठाठ बाट में हैं देव पाषाण वहीँ ..

भूखा मरे कोई अजब संजोग हैं ||

                           चादरें चढती ..रहीं मजारों पर

                        इंसानियत के ..उन निशानों पर

                          मर गया कोई वहीँ ...नग्न ही ...

                     ठंडी सी ...पथरीली उन्हीं राहों पर ||

ख़्वाब भी देखा नहीं था भरी थाली का कभी |

 रुखा -सूखा ही बहुत हुआ मिल जाए जो कभी |

यहीं कहीं फुटपाथ पे ...जिन्दगी यूँ ही कटती रही...

सोया भी सुकून से बेशक !तन पे कपड़ा न हो कभी ||

                       देखना क्या ..उस भरी थाली को ..

                    जों अपने नसीब में तो हरगिज नहीं !

                    इस करीने से... सजा है वह ..क्या ..?

                    नाम तक वह ..जानना चाहता नहीं !!





इंसान को इंसान कहना होगा -

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हमें सुनो न सुनो , उनको तो तुम्हें सुनना होगा

आग अपनी न सही, किसी की जलIना होगा -

             खुरदुरी जमीं के कदम ऐसे अजनवी क्यों हैं,

         जख्म उनके भी तुम्हें आहिस्ता सिलना होगा -

अगर ली है इंसIनियत की हलफ, माना खता हुई ,

      भरी इजलास इंसान को इंसान कहना होगा -

 

       

 

               मैं नहीं हूँ मैं

 

तेरा ख्याल हूँ बस कुछ और नहीं हूँ मैं

आकर मुझे संभाल ले बस मैं नहीं हूँ मैं !

अपने आंसुओं को रोक ले मेरा ख्याल कर          

गहरा बहुत हूँ मगर समंदर तो नहीं हूँ मैं !

मेरे गुस्से से तू मुझे इस तरह तो न परख

बेशक सख्त हूँ बहुत,पर पत्थर नहीं हूँ मैं !

मेरे भीतर है तू अगर, तो मुझको थाम ले

जिन्दगी और मौत का चक्कर नहीं हूँ मैं !

बेशक जिन्दगी बड़ी दुश्वारी है नाउम्मीदी की राह में

अपने आंसुओं से भरा समंदर हूँ

मगर मौत का चक्कर नहीं हूँ मैं !

 

 

किस पर किसका अहसान

आत्मा ही परमात्मा है । आत्मा की प्रभुता का सम्मान

मनुष्यता से लेकर ईश्वरत्व का ही सम्मान है। मनुष्य

के सारे घटक मनुष्य का साथ दे सकते हैं परमात्मा

नहीं । क्योंकि आत्मा की सच्चाई है । उसे झूठ, दंभ,

पक्षपात, घृणा, हिंसा, अन्याय कतई पसंद नहीं ।

दरअसल आत्मा की सघनता और उपस्थिति का

अहसास परमात्म का की सघनता और उपस्थिति का

अहसास है । आत्मा का पतन दरअसल मनुष्यता से

लेकर परमात्मा का ही पतन है । इसलिए परमात्मा के

अंत की घोषणा बार-बार वही करता है जो आत्मारहित

होता है, या आत्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता ।

आत्मा का आदर्य मनुष्यता का आदर्य है । आत्मा का

ज्ञान-विज्ञान सर्वोपरि है । उसे किसी भौतिक विज्ञान

के अनुशंसा या प्रमाणपत्र की कोई जरूरत नहीं ।

आत्मा जितनी बची रहेगी, संसार का सौंदर्य और

सुख-शांति उतनी ही बची रहेगी ।

आत्मा की प्रभुता का सम्मान मनुष्यता से लेकर

ईश्वरत्व का ही सम्मान है । जो बार-बार घोषणा करता

है :-

डरे हुए को अभय दान दो, भूखे को अनाज का दान।

प्यासे को दो जल का दान्,अपमनित को आदर  - सम्माऩ

विद्या दान करो अनपढ को, विपद ग्रस्त को आश्रय दान

वस्त्रहीन को दो वस्त्र का दान, रोगी को औषध का दान।

धर्म रहित को धर्म सिखाओ, शोकातुर को धीरज दान ।

भूले को सन्मार्ग बता दो, गृह विहीन को दो गृह दान ।

करो सभी निस्वार्थ भाव से, मन मे कभी ना हो अभीमान ।

अपने सम सबही को मानो, फिर किस पर किसका अहसान ।

डॉ. माया शंकर झा,
           

            अध्यक्ष ,

भारत भारती समाज

 

 

 We needs  our incessant and huge protest against corruption :

 

Corruption, exploitation and injustice have

become major setbacks in developing and

establishing peace, justice, harmony,

cordial relation, sustainable growth and

sustainable development in society.

Therefore we need to get together to

our incessant and huge protest against

corruption, exploitation and injustice to

save our prospective generation which is

going to sink to the bottom of sea of

corruption, exploitation and injustice. We

have to save our future generation fighting

against those factors.

 

 

सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति...

 

मनुष्य के विभिन्न भावों का नाम कल्चर या संस्कृति है I सभ्यता

क्या है? अपने जीवन की विभिन्न गतिविधियों के बीच शिष्टाचार

के जिस सूक्ष्म भाव का स्पर्श हम लोग पाते हैं, उसी का नाम है

सभ्यता.. एक उदाहरण के तौर पर मान लेते हैं - घर में एक

अतिथि आए हैं, और हम लोग सरल भाव से उनको 'आओ' कह

कर बुला सकते हैं.. और स्वागत करते हुए यह भी बोल सकते हैं,

कृपा करके आइये या आइये, आइये, भीतर आइये! यह जो

अतिरिक्त भाषा या विशेष भाव द्वारा भद्रता की अभिव्यक्ति हमने

की, यही सभ्यता का आचरण है I

 

हम लोग देखते हैं कि संस्कृति या कल्चर के माध्यम से शिष्टाचार

का जो सूक्ष्मबोध हम लोग पाते हैं, वह मनुष्य की संवेदनशीलता

की वृद्घि करता है.. आचार और आचरण में इसी की अभिव्यक्ति को

हम सभ्यता बोलते हैं.. सभ्यता मनुष्य की संवेदना को, उस सूक्ष्म

विचार क्षमता को वृहद् क्षेत्र में ले जाती है।..कई बार देखा जाता है

कि किसी व्यक्ति का किसी एक जगह तो सम्मान हुआ, पर दूसरी

जगह नहीं हुआ...ऐसा हो सकता है कि पहली वाली जगह के लोग

ज्यादा सभ्य और दूसरी जगह वाले अर्धसभ्य हों..

 

भारतीय समाज व्यवस्था में नारी को मातृत्व की मर्यादा दी गई

 है.. किन्तु दैनिक जीवन में नारी के प्रति उस तरह का सम्मान

प्रदर्शित नहीं किया जाता है..

 

दूसरी तरफ, यूरोपीय समाज में धर्म और नीति वचनों में स्त्री का

बहुत गुण-गायन नहीं किया गया, किन्तु वास्तविकता में

महिलाएं निश्चित रूप से पुरुष के समान अधिकार और सम्मान

प्राप्त करती हैं.. अब इन दोनों के बीच कौन अधिक सभ्य है, यह

बोलना बहुत मुश्किल है.. पर मैं कहूंगा कि आचार और आचरण में

जितना अधिक साम्य होगा, सभ्यता का विकास भी उतना ही

अधिक होगा...और इसके लिए हमें यूरोपीय देशों से बिना किसी

संकोच के सीख लेनी चाहिए ..

 

सभ्यता और संस्कृति के बीच का भेद बहुत ही सूक्ष्म है.. संस्कृति

की सभी अभिव्यक्तियों का सामूहिक रूप सभ्यता है.. संस्कृति

बौद्घिक स्तर की अभिव्यक्ति है.. किन्तु सभ्यता जीवन की भौतिक

दशा का चित्र है.. इसलिए एक मनुष्य भौतिक उन्नति के विषय में

सभ्य हो सकता है, किन्तु उसके मानसिक विकास की ओर विचार

करने पर वह सुसंस्कृत नहीं भी हो सकता है...यदि बौद्घिक विकास

नहीं हो तो मनुष्य का सभ्य होना भी संभव नहीं है..

 

सभ्यता का विकास कैसे होता है? सभ्यता के साथ विज्ञान का

घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है.. एक ही साथ दोनों की उन्नति होती है..

किन्तु जहां वैज्ञानिक उन्नति, सभ्यता की उन्नति को पीछे की

ओर फेंक देती है, वहीं सभ्यता की नौका डूबने लगती है..

 

मिस्र और ग्रीस के इतिहास साक्षी है की जितने समय तक इन

दोनों देशों के विज्ञान की जय यात्रा ने सभ्यता की विकास की

उपेक्षा नहीं की, उतने समय तक वहाँ सभ्यता के विकास की गति

 अबाधित रही.. किन्तु जब विज्ञान की उन्नति और उसके माध्यम

से भोग्य सामग्री इतनी बढ़ गयी कि लोगों को बौद्धिक विकास और

संवेदनशीलता का विकास गैरजरूरी लगने लगा, तो वहाँ की

सभ्यताएँ भी ध्वस्त होने लगीं... क्योंकि विज्ञान ने सभ्यता के

ऊपर आधिपत्य जमा लिया..

 

विज्ञान ने कभी भी सभ्यता से अधिक सम्मान प्राप्त नहीं किया..

मानव समाज की सर्वांगीण प्रगति तथा उन्नति के लिए, सभ्यता

और विज्ञान दोनों को एक साथ ही प्रोत्साहित करना और आगे ले

चलना होगा.. जहां तुम सभ्यता की उन्नति देखोगे, वहीं लक्ष्य

करोगे कि विज्ञान चर्चा के साथ ही बौद्घिकता का विकास भी चल

रहा है..

 

सभ्यता और विज्ञान -दोनों क्षेत्रों में बौद्घिक ज्ञान अनिवार्य है..

 

सभ्यता और विज्ञान के सुन्दर समन्वय के द्वारा ही आध्यात्मिक

और बोधि ज्ञान का विकास सम्भव है.. सभ्यता और विज्ञान के

बीच सूक्ष्म संबंध रहने से आध्यात्मिक प्रगति शीघ्र होगी..

इसलिए जो ज्ञानी हैं, वे दोनों के बीच संतुलन करके ही प्रगति के

पथ पर चलते हैं.. इन दोनों के बीच संतुलन छोड़कर, बोधि जगत

में प्रगति की इच्छा करना अर्थहीन है.. अगर हम विज्ञानं का प्

रयोग अपने सभ्यता और संस्क्रति के विकास में करेंगे तो मानवता

का हित होगा और अगर इसका दुरूपयोग करेंगे तो विनाश ...

 

सनातन विज्ञान बहुत विकसित विज्ञानं है और हम अगर आज की

युवा पीढ़ी को यह रहस्य समझने के तैयार कर लें लो भारत फिर से

विश्व शिरमौर बन जायेगा ..

 

हमें चाहिए की हम कोई एक संस्था का निर्माण करें जिसमें युवाओं

को वैज्ञानिक पद्धति से धर्मं और सनातन संस्कार और सनातन

विज्ञानं तथा मंत्र विज्ञानं इत्यादि को समझ कर मेडिकल इत्यादि

क्षेत्रो में नित्य नए आविष्कार करने का अवसर मिल सके .. और

वो युवा निश्चित रूप से सम्पूर्ण मानव प्रजाति का कल्याण करेंगे

भीतर सनातन संस्कार ,सनातन विज्ञानं का भण्डार होगा.. यह

मेरी अपनी विचारधारा है , जरुरी नहीं की आप भी सहमत हों

..लेकिन अपने अपने विचार देकर कृपया इस विषय पर मेरा

मार्गदर्शन अवश्य करें I

 

                                                               आपका मित्र ,

                                                       डॉ. माया शंकर झा ,

                                                       भारत भारती समाज

                                                                  कोलकाता

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